दस पद्धतियाँ

यह विश्वास करने में कठिनाई हो रही है कि आजादी के 52 साल बाद भी इस देश की आम जनता को इतने कठिन परिस्थितियों में जीना पड़ रहा है। जितने भी शिकायत सुनने को मिलते हैं उनमें से अधिकतर भूमि से सम्बंधित हैं। सहरिया आदिवासियों से जमीन छीनने के लिए जो-जो तरीके अपनाये गये हैं उन तरीकों की जानकारी एक-एक करके मैं समझ रहा हूंँ। क्षेत्र से बाहर बैठकर मैं कोई अंदाजा नहीं लगा सकता था कि गरीबों के हाथ से जीवन जीने के संसाधन हड़पने के लिए इतने सारे तरीकों का आविष्कार किया गया है। इन पद्धतियों को एक-एक करके समझने का प्रयास म्ें यहां करना चाहता हूँ :

 

1.    एक प्रचलित पद्धति जो हर गांव में समान रूप से दिखाई पड़ रहा है उसे मैं कोयल और कौवा की कहानी से जोड़ता हूँ। आपने सुना होगा कि कोयल कौवा के घोंसले में अण्डा डालते हैं और जब उसे पाल पोस कर कौवे तैयार करते हैं तब वह कौवा के साथ जुड़ जाते है। मतलब यह कि मेहनत कोई और करता है और फायदा कोई और उठाता है। इस इस इलाके में आदिवासी लोग कठिन परिश्रम करे जो जमीन तैयार करते हैं, भले वह राजस्व की जमीन हो या वन विभाग की, उसे बंदूक और डण्डे के बल पर बड़े लोग छीन लेते है। 10 एकड़ खेती योग्य जमीन बनाने में आदिवासियों को एक वर्ष लगा होगा, पूरे परिवार का कठिन परिश्रम लगा होगा, लेकिन एक ही दिन में वह उनके हाथ से छीन लिया जाता है। ऐसे सैकड़ों आदिवासियों से प्रतिदिन मुलाकात करते हुए मैं आगे बढ़ रहा हूँ। इनके जमीन और जीवन की रक्षा करने की तैयारी शासन-प्रशासन में नहीं है क्योंकि भ्रष्ट कर्मचारियों और नेताओं को खरीदा जा सकता है। चुनाव जीतने के लिए आदिवासियों के सामने हाथ जोड़ने वाले नेता स्वयं भी कई स्थानों पर उनके ही जमीन को कब्जा किये बैठा है। अब अगर आप नियम पारित भी कर लें कि 1980 के पहले वनभूमि पर काबिज लोगों को पट्‌टा देंगे तब भी वह पट्‌टा आदिवासियों को नहीं मिलने वाला है क्योंकि वह जमीन अब उनका नहीं रह गया है। अब इस घोषणा की आड़ में वह तमाम लोग पट्‌टा प्राप्त करेंगे जिन्होंने बल, डण्डे और बंदूक के दम पर आदिवासियों से जमीन छीना है। भ्रष्ट और निष्क्रिय प्रशासन से क्या उम्मीद किया जा सकता है कि सही जांच के आधार पर सही आदमी को पट्‌टा दिया जायेगा ?

 

2.    हजारों आदिवासियों की जमीन वर्षों से गिरवी रखी हुई है। 500/- रूपये में 5 एकड़ जमीन, 5 किलो अलसी के बदले 4 एकड़ जमीन, 2000 रूपये के लिए 10 एकड़ जमीन ऐसे लम्बी सूची मेरे सामने है। मुसीबत के वक्त में आदिवासी अपने जमीन को गिरवी रखकर पैसा ले लते हैं। रोज मजदूरी करके जीने वाले ये लोग यह राशि वापस नहीं कर पाते, अंततः जमीन उनके हाथ से निकल जाती है। यह जमीन पट्‌टे का हो सकता है और बिना पट्‌टे का भी लेकिन इस जमीन का निरंतर उपयोग वही कर रहा है जिसने पैसा दिया है। इनमें से कई लोग उस जमीन का पट्‌टा खुद  के नाम पर बना भी चुके है। भू-राजस्व संहिता की धारा 170 (क) और (ख) का कानून तो बना लेकिन इस कानून को लागू करने की जिम्मेदारी उसी शासन-प्रशासन को सौंपी गयी है जो गरीबों के हित में बने किसी भी कानून को सही ढंग से कभी लागू ही नहीं किया। अब क्या उम्मीद किया जा सकता है कि 170 (क) और (ख)  के तहत ईमानदारी से सर्वे होगा और उन गरीब आदिवासियों को उनकी अपनी जमीन वापस दिलायी जायेगी। मैंने सुना है उड़ीसा के आदिवासियों ने मारवाड़ियों को घेर लिया और उनसे 20-20 साल का हिसाब करके गिनकर पैसा लिया और फिर गांव से भगा दिया। अगर इस क्षेत्र में आदिवासी संगठित हो जायें और हिसाब करने लग जायें तो स्थिति सरकार के काबू से बाहर चला जायेगा। समय रहते हुए भ्रष्ट सरकार और प्रशासन को अब कम से कम अपनी कुर्सी बचाने के लिए 170 (क) और (ख) का प्रयोग शक्तिशाली ढंग से इस क्षेत्र में करना ही होगा।

 

3.    शासन की घोषणा यह है कि जिस क्षेत्र में आदिवासी, हरिजन, गरीब भूमिहीन हैं पहले उन्हें भूमि दिया जाना चाहिये। कराहल जैसे क्षेत्र को जो आदिवासी बहुल क्षेत्र होने के कारण आदिवासी विकासखण्ड घोषित किया गया है वहां भी बहुत सारे गैर-आदिवासियों को भूमि का पट्‌टा दिया गया है जबकि हजारों गरीब आदिवासी भूमिहीन हैं। एक प्रचलित तरीका जो सरकार इस देश में इस्तेमाल कर रही है वह है आदिवासी को फरार घोषित करना। रिकार्ड में यह दर्शाया जाता है कि गांव की बैठक में चूंकि कोई आदिवासी भूमिहीन उपस्थित नहीं हुए इसलिए पट्‌टा भूमिहीन गैर आदिवासी को दे दिया गया। इस प्रचलित बेइंसाफी के तरीके को इस्तेमाल करके भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों ने आदिवासियों को धोखा दिया है इसलिए बहुत सारे आदिवासी भूमिहीन हैं, जबकि धनी गैर-आदिवासी इस क्षेत्र में सम्पन्न भूमि स्वामी हैं।

 

4.    एक मजेदार तरीका जो सरकारी कर्मचारी इस्तेमाल कर रहे हैं उसकी जानकारी सामने आयी। कई विभागों के कर्मचारी ने राजस्व विभाग के कर्मचारियों की मदद से आदिवासी क्षेत्र में भूमि प्राप्त किये हैं। अक्सर यह भूमि बहुत कम दाम में खरीदा जाता है। रिटायरमेंट के बाद इनमें से कुछ लोग स्वयं खेती करते हैं, कुछ अधबटाई पर दूसरों को देते है और अन्य लोग जमीन बेचकर पैसा बनाते हैं। इससे पूर्व ऐसी ही एक घटना दमोह जिले में मुझे देखने को मिली है। दमोह के ग्राम गुढ़ा में हरिजन लोग 65 एकड़ जमीन पर वर्षों से काबिज थे। रिटायर तहसीलदार ने इस जमीन को अपने नाम पट्‌टा करा लिया और उसके बाद जमीन किसी बड़े पैसे वाले को बेच दिया। जब वह धनी आदमी ट्रैक्टर लेकर खेत जोतने के लिए ग्राम गुढ़ा में पहुंचा तभी ग्रामीणों को मालूम हुआ कि उनके साथ धोखाखड़ी हुई है। चूंकि वहां संगठन सशक्त था इसलिए उन लोगों ने लड़कर ट्रैक्टर वाले को भगया।ऐसे ही कुछ घटनाएं सहरिया आदिवासियों के साथ भी घटती चली आ रही है। ग्राम मदनपुर में कार्यरत मुरैना के पटवारी श्री शम्भूदयाल श्रीवास्तव ने रिटटायरमेंट के बाद सात आदिवासियों के द्वारा जोते जाने वाले 65 बीघा जमीन को अपने नाम पट्‌टा करा दिया और उसके तुरंत बाद ही मुरैना निवासी परिवेन्द्र श्रीवास्तव को बेच दिया। अब यह मुरैना निवासी जीप और बंदूकधारियों सहित रात के वक्त गांव में पहुंच जाते हैं और आदिवासियों को हुक्म देते हैं कि अगर जीवन प्यारा हो तो खेत छोड़ दें, भयभीत आदिवासी किसके शरण जायें? थाने में रिपोर्ट करना आसान नहीं है, वहां रिपोर्ट लिखने के लिए पैसे की मांग है। नेताओं के पास जाने से कोई फायदा नहीं है क्योंकि नेताओं का इन बड़े लोगों के साथ कई प्रकार की रिश्तेदारी है। लट्‌ठ, गाली और जूता इस इलाके में साधारण बात है और बड़े लोग सिद्धांततः इस बात को मान लिये हैं कि आदिवासियों को इन तीनों औजार से दबाया जा सकता है। हरिजन आदिवासी अत्याचार अधिनियम काफी पुराना है लेकिन उसका उपयोग जिस ढंग से इन आदिवासियों को संरक्षण देने के लिए होना चाहिये था वैसा हुआ ही नहीं। थाने वाले इस नियम के तहत केस इसलिए रजिस्टर्ड नहीं करना चाहते कि दूसरे पक्ष से और अधिक पैसा वसूला जा सकता है। अक्सर थाने में बैठे हुए ऐसे ही लोग हैं जो आदिवासियों के प्रति सहानुभूति नहीं रखते फलतः प्रतिदिन हजारों गरीब आदिवासी लोग गाली सुन रहे हैं और पिट रहे हैं। यह परिस्थिति ऐसी बनी रही तो वह दिन दूर नहीं है जब आदिवासी संगठित होकर आक्रोशव्यक्त करना प्रारंभ कर दें और तब शासन-प्रशासन यह कहकर बच नहीं सकेगा कि इन आदिवासियों की समस्याओं से निपटने के लिये नये-नये थाने खोला जायेगा मंत्रियों, विधायकों और सरकारी कर्मचारियों को बचाने के लिए जो पुलिस बल का दुरुपयोग किया जा रहा है, क्या उस पुलिस बल का उपयोग आदिवासियों की रक्षा में नहीं कर सकते। आखिर जिनकी रक्षा के लिए सरकारी तंत्र बना है अगर वे स्वयं अपनी ही रक्षा में लगे रहेंगे तो आम गरीब जनता की रक्षा का दायित्व किसके ऊपर है ?

 ग्राम बुखारी चक में क्षेत्र के विधायक स्वयं 250 एकड़ जमीन का कृषि फार्म बनाये हुए हैं। एक बैठक में उस गांव का गरीब आदिवासी खड़ा होकर कहने लगा कि वे विधायक के खेत में हाड़ी लगा हुआ है। साल भर के लिए किसी के खेत में लगने वाले व्यक्ति को हाड़ी कहते हैं। इसके एवज में उन्हें 3000 से 7000 रुपये तक सालाना मिल जाता है। ऐसी बात नहीं है कि यह बात प्रशासन की नजर में नहीं आयी है लेकिन नेताओं के लिए सब प्रकार की छूट है। ऐसी बहुत सारी घटनायें मेरे सामने आयी कि जहां सहरिया आदिवासी अपने ही खेत में हाड़ी के रुप में काम कर रहे हैं।

 

5.    एक मजेदार घटना ग्राम बुढ़ेरा के कार्यक्रम के दौरान समझ में आया। इस गांव में नरेन्द्र सिंह गुर्जर नामक एक मालगुजार है उसके आतंक से पीड़ित होकर आदिवासी लोग दूर जाकर अपना घर बसाये हुये हैं। अब थोड़ा बहुत वे नरेन्द्र सिंह के आतंक से मुक्त हैं लेकिन अब भी पूर्ण रूप से भयमुक्त नहीं हैं। उन्हें डर है कि नरेन्द्र कभी भी किसी पर भी हमला बोल सकता है चूंकि नरेन्द्र के पास काफी बड़ी खेती है इसलिए आदिवासियों पर यह दबाव है कि सब लोग पहले उनके खेत में लगे। उनका काम पूरा होने के बाद ही खुद के खेत में काम करने की उन्हें अनुमति मिलेगी। इस कारण से बहुत सारे आदिवासी अपने खेत कभी जोत ही नहीं पाते थे। इस प्रकार जब खुद का खेत बिना जोते बोये पड़ा रहता है तब पटवारी किसी न किसी बड़े व्यक्ति को पैसे के बल पर उस जमीन का मालिक घोषित करता है और पैसा कमाता है। इस प्रक्रिया को सही ढंग देने के लिए आदिवासी भूमि स्वामी को पटवारी रिकार्ड में फरार घोषित कर देते हैं। फरार व्यक्ति की जमीन दूसरे किसी को देना न्याय संगत नहीं है। इस प्रक्रिया को अपनाकर बहुत सारे आदिवासियों की जमीन अन्य लोगों ने अपने नाम कर लिया है। 

 

6.    एक विशेष तरीका जिसके आधार पर कई लोगों ने जमीन हड़प लिया है वह काफी सरल तरीका है। चूंकि कानून के तहत गैर आदिवासी व्यक्ति, आदिवासी क्षेत्र में जमीन नहीं खरीद सकता, इसलिए ये दुराग्रही लोग घर में हाड़ी लगे हुए या कई वर्षों से नौकरी करने वाले वफादार आदिवासी नौकरों के नाम जमीन खरीद लेते हें। रिकार्ड में जमीन आदिवासी की होगी जबकि असलियत में जमीन का मालिक कोई बड़ा आदमी होगा। ऐसी घटनाऐं इस क्षेत्र में काफी विवाद में हैं। ऐसी बात नहीं है कि यह तरीका सिर्फ चम्बल क्षेत्र के आदिवासियों के बीच में अपनाया जा रहा है। ऐसी घटनायें मध्यप्रदेश के अन्य आदिवासी इलाकों से भी सुनता रहता हूँ। ऐसा भी नहीं कि इस बात की जानकारी सरकारी महकमें को न हो। चूंकि इन घटनाओं में लगे हुए अधिकतर लोग सम्पन्न हैं, इसलिए इनके ऊपर कोई कार्यवाही नहीं होती। भ्रष्ट प्रशासन से यह उम्मीद करना भी कठिन है कि वे पैसे के बदले न्याय और सत्य को ज्यादा महत्व देंगे।

 

7.    आदिवासियों को जमीन से वंचित करने का एक बहुचर्चित तरीका यह है कि सीमांकन नहीं करना। श्योपुर, कराहल क्षेत्र के हजारों गरीब आदिवासी ऐसे हैं जो 20-20 साल से अपने जमीन का पट्‌टा लेकर सरकार से निवेदन कर रहे हैं कि उन्हें उनकी भूमि दिखाया जाये, लेकिन सरकारी महकमें में बैठे हुए लोग इस कार्य में रुचि नहीं रख रहे हैं क्योंकि उन्हीं की मदद से कई धनी लोग उन जमीनों पर काबिज हैं। सीमांकन हुए बिना इन दबंग लोगों से जमीन वापस लेना गरीब आदमी के वश की बात नहीं हैं, भले ही उन्हें मालूम हो कि उनकी जमीन कहां है। सीमांकन के अभाव में बहुत सारे आदिवासी उनकी अपनी ही भूमि में दूसरों के लिए मजदूरी कर रहे हैं। कहीं-कहीं  जहां लोगों ने पैसा जमा करके सीमांकन कराना चाहता वहां झगड़ा खड़ा हो गया है क्योंकि जो जमीन सीमांकन करके दिखाया जा रहा है उसमें दूसरा कोई काबिज है। ऐसी लड़ाईयों से विभाग के कर्मचारियों की कमाई बढ़ती है क्योंकि जिसकी जमीन पर झगड़ा खड़ा हो जाता है वह भी पैसा देकर मामला ठीक करवाना चाहते हैं।

 

8.    आदिवासियों का पट्‌टा छीन लेना और उन्हें जमीन से वंचित कर देना एक प्रचलित पद्धति है। जो आदिवासी किसी परिवार में हाड़ी लगा हुआ होता है उन्हें बहला-फुसला कर यह समझाया जाता है कि उनकी जमीन को टैक्स पटाना है या ऋण पुस्तिका दिखाकर कुछ सहयोग सरकार से प्राप्त करना है चूंकि आदिवासी मालिक के प्रति वफादार है इसलिए पट्‌टा देने से इंकार नहीं कर सकते, उसके बाद वह दस्तावेज कभी वापस आदिवासी किसान को वापस नहीं दिया जाता है। धीरे-धीरे आदिवासी किसान यह मानने लगता है कि वह जमीन उनकी नहीं है। कुछ वर्षों में वह इस बात पर विश्वास करने लगता है कि वह भूमिहीन है और सरकार से भूमिहीन की हैसियत से जमीन मांगने लगता है जबकि उनके स्वयं का खेत धोखे से उनसे छीन लिया गया है। ऐसी घटनाएं इस क्षेत्र में बहुत अधिक हैं। गहराई से जांच करें तो मालूम होगा कि बहुत सारे भूमिहीन आदिवासी एक जमाने में भूमि स्वामी था लेकिन कुचक्र  में फंसकर वे भूमिहीन हो गये। भू-राजस्व संहिता की धारा 170 (क) और (ख) अगर ईमानदारी से लागू किया जाये तो इनमें से अधिकतर लोगों को अपने हक की जमीन वापस दिलाया जा सकता है।

 

9.    ताकतवर लोगों के द्वारा जमीन छीनने की बात जितना विचारणीय है, उतना ही विचारणीय है वन विभाग द्वारा गरीबों की जमीन छीनने की। घटनायें ग्राम सिलपुरी में 15 आदिवासियों की 350 बीघा जमीन सामाजिक वानिकी के नाम से वनविभाग ने वर्ष 1984 में छीनने का प्रयास किया। इसके बदले आदिवासी किसानों को भूमि देने का वायदा आज तक पूरा नहीं हुआ। जो किसान वापस अपने जमीन में जाने का प्रयास किया उनके हल-बैल जप्त  करने की और उन्हें परेशान करने की घटनाऐं हुई। इसी प्रकार आदिवासी लोग वन विभाग का जिस जमीन को खेती योग्य बनाकर वर्षों से खेती कर रहे थे वहां से उन्हें भगाया गया। वन विभाग द्वारा जो कुल्हाड़ी, सब्बल, सायकल और बैल गाड़ी आदिवासियों से छीना गया है उसका हिसाब अगर ईमानदारी से लगाया जाये तो करोड़ों की सम्पत्ति होगी। यह कहना कठिन है कि उनमें से कितनी संपत्ति सरकारी रिकार्ड में दर्ज हुई है और कितनी संपत्ति बाहर बेच दी। एक तरफ आदिवासियों की निजी जमीन वन विभाग के द्वारा छीनने की घटनाएं हैं जिससे वर्षों के प्रयास के बावजूद  भी वापस लेना कठिन हो रहा है तो दूसरी ओर मेहनत से खेती योग्य बनाई गई जमीनों से आदिवासियों को मारपीट कर भगाने की घटनाएं हैं। मध्यप्रदेश शासन की घोषणा है कि 1980 से पूर्व के काबिज जमीनों का पट्‌टा उन्हीं भूमिहीन किसानों को दिया जायेगा। लेकिन अब बिना किसी प्रकार के जांच के लम्बी अवधि से काबिज जमीनों से गरीब आदिवासियों को भगाना वायदा-खिलाफी है। एक तरफ आदिवासियों को मार पीटकर भगाया जा रहा है तो दूसरी तरफ वन विभाग के जमीनों पर काबिज दबंग लोगों के ऊपर  कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। ऐसी भी कई घटनाएं सामने आयी हैं तब वन विभाग के कर्मचारी तथाकथित वन विभाग को जमीन से वनवासियों को भगाकर उसी स्थान पर गैर आदिवासियों को पैसा देकर काबिज कराये हैं। आदिवासी और वन विभाग के बीच में वर्तमान में जो रिश्ता है वह दुश्मनी का है। आदिवासियों को दुश्मन बनाकर बाहरी ताकतों को अंदर लाकर बसाने की वन विभाग की जो कोशिश है इसका परिणाम आने वाले दिनों में खतरनाक होगा। समय रहते हुए इस बात को समझाना है। एक उच्च पदासीन सरकारी कर्मचारी ने बताया कि इस क्षेत्र की स्थिति सुधारने के लिए और सहरिया आदिवासियों को खेती के प्रति प्रेरित करने के लिए बाहरी लोगों को बसाना जरुरी है। लेकिन जिस ढंग से स्थानीय लोगों के संसाधनों पर बाहर से आये हुए लोगों ने हमला किया है उसे समझे बिना और उसके रोकथाम के लिए आवश्यक व्यवस्था किये बिना इस प्रकार के दोष को बढ़ावा देना सिर्फ इस बात का द्योतक है कि प्रशासन में बैठे हुए लोग सुंदर कृषि फार्म को देखकर खुश हो रहे हैं लेकिन उसके पीछे जो दर्दनाक  कहानी है उसे समझना नहीं चाहते हैं।

 

10.   सहरिया आदिवासियों में शराब का प्रचलन बहुत अधिक है। आदिवासी होने के कारण जो छूट मिली है वह तो है ही उसके ऊपर से शराब ठेकेदारों के द्वारा वैध-अवैध ढंग से जो शराब गांव-गांव पहुंच रही है वह भी आदिवासियों की बर्बादी का कारण बन रहा है। शराब एक प्रकार से आदिवासियों की बर्बादी का कारण बन रहा है। शराब एक प्रकार से आदिवासियों और गरीबों के विरोध में साजिश है। गरीबी से कभी मुक्त न होने वाले आदिवासी शराब के नशे में जो कुछ उनके पास है उसे या तो गिरवी रखते हैं या बेच देते हैं। सहरिया आदिवासियों से जो जमीन छीनी गई है उसमें बहुत सारी कहानी शराब से जुड़ी हुई होगी। शराब के कारण महिलाओं के ऊपर होने वाले अत्याचार में भी वृद्धि होती है। बंधुआ मजदूरों के बीच में काम करते-करते मैं इस बात का गहराई से विश्वास करने लगा हूँ कि कि नशे में रखकर गरीबों को गुलाम बनाया जा सकता है। खदानों में काम करने वाले मजदूरों को रविवार को छुट्‌टी के दिन मुफ्त में शराब पिलाने वाले ठेकेदारों को में जानता हूँ। सहरिया आदिवासियों के बीच में भी हाड़ी में लगे हुए मजदूरों को शराब पिलाकर खुश करने वाले मालिकों की कहानी भरपूर है।

 

ऐसी बात नहीं है कि सिर्फ ऊपर दिखाये गये दस तरीकें ही गरीबों, आदिवासियों से जमीन छीनने के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। इसके अलावा भी छोटे-मोटे कई तरीके प्रचलित है।

 

लेकिन यह 10 तरीके काफी व्यापक रुप से इस्तेमाल किये गये हैं इन तरीकों को इस्तेमाल करने में दबंग लोगों को सरकारी कर्मचारी और राजनेताओं का सहयोग प्राप्त है या ऐसा कहूँ कि तीनों मिलकर पांचों उंगली घी में वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। तो अतिश्योक्ति न होगी राजनैतिक पार्टियां जिससे उम्मीद किया जा रहा था कि शोषण मुक्त समाज की रचना में जुटेंगे वे स्वयं इस शोषण के जाल को फैलाने में लगे हुए हैं। अब इसका जवाब समाज सेवी संगठन और जनसंगठन ही दे सकते हैं और इस दिशा में कार्यरत संगठनों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय सहयोग मिले तभी वे इस क्षेत्र में ठीक से शोषण के इस जाल को तोड़ सकेंगे।

 

 

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