गांव को निस्तेज करती शासन व्यवस्था

कार्ल माक्र्स ने कहा है कि राज्य की सत्ता खत्म होनी चाहिये और गांधी जी ने कहा है कि ग्रामीण समुदायों को सशक्त बनाना चाहिये, उसे आत्मनिर्भर भी होना चाहिये और राज सत्ता कमजोर होनी चाहिये. गांधी जी चाहते थे कि भारत को गांवों का संघ बने और वो भी आत्मनिर्भर हों, जो लोग राजसत्ता पर नियंत्रण रखते हैं, उन्होंने इस भ्रम से लाभ उठाया है कि राजसत्ता मजबूत होनी चाहिये, ताकि लोगों की सुरक्षा की जा सके, लेकिन सच्चाई यह है कि राजसत्ता लोगों को कमजोर बनाने एवं स्वयं को ताकतवर बनाने में सफल हुई है. इसी प्रक्रिया में राजसत्ता ने लगभग 12000 (बारह हजार) गांवों को भारत के मानचित्र से गायब कर दिया है. ये सभी गांव वर्तमान में नवउदारवाद एवं जागतीकरण के प्रक्रिया के शिकार बन चुके हैं.

स्वतंत्र भारत के 60 वर्षों में सत्ताधारियों ने गांवों के लोगों में हीन भावना भर दी है कि वे अशिक्षित हैं, पिछड़े हैं. इस सत्ताधारियों ने गांव समुदाय के मनोबल को तोडऩे का काम किया है. ग्रामीण समुदायों ने उन्होंने इस कदर हीनभावना भर दी है कि उन्हें मजबूरन इस आशा में शहर में जाना पड़ता है कि शायद उन्हें शहर में इज्जत मिलेगी. राजसत्ता के कर्णधारों ने ग्रामीणों को जातियों में एवं दलों में विभाजित कर दिया है और उन्होंने सभी गांवों में अपने-अपने दलाल नियुक्त कर रखे हैं. उन्होंने वकीलों, डॉक्टरों, पुलिस एवं नेताओं के माध्यम से उन गांवों के व्यक्तियों को ठगने, लूटने एवं शोषण करने की हरसंभव छूट दे रखी है. गांवों में लोगों की एकता को तोडऩे का ये लोग हरसंभव प्रयास करते रहते हैं. ग्रामीण समदायों की रीढ़ की हड्ïडी तोडऩे में शहर में बैठे लोगों की बड़ी भूमिका रही है, जिन्होंने इन सत्ताधारियों के साथ मिलकर लाभ उठाया है. जो लोग इस राजसत्ता प्रणाली को चुनौती देते हैं, उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ती है, क्योंकि सत्ता में बैठा वर्ग किसी भी तरह का विरोध सनने में दिलचस्पी नहीं रखता और विरोधों को दबाने में लगा रहता है.

एक बार एक अंग्रेज ने गांधी जी से पूछा था कि हम आपकी क्या मदद कर सकते हैं? उनका जवाब था कि आपकी मदद की हमें जरूरत नहीं है, लेकिन हम चाहते हैं कि आप हमारे पीठ से उतर जाइए. ‘यानि आप हमें अपने स्वयं की इच्छा पर छोड़ दें कि हम क्या चाहते हैं. इसी तरह आज सभी राजनैतिक दल गांव वालों से पूछ रहे हैं कि हम आपके लिये क्या कर सकते हैं? उसी तरह गांव के सभी लोगों को एकजुट होकर राजनैतिक दलों को यह कहने की जरूरत है कि इन दलों का बोझ लोगों के कंधों पर है, यही सबसे बड़ी समस्या है. यदि ये दल गरीब जनता के कंधे से उतर जाये तो गांव की जनता पर यही सबसे बड़ा उपकार होगा. अभी हाल ही में सुशासन के नाम पर बहुत धन खर्च किया गया है. आज के शासकों के लिये अच्छे शासन का अर्थ है ज्यादा से ज्यादा कम्प्यूटर और ज्यादा से ज्यादा गाडिय़ां का उपयोग करना, लेकिन उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है. अधिकारियों और नेताओं का अहंकार दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है और वे जनता से कुछ सीखने को तैयार नहीं हैं. सुशासन के नाम पर अधिक से अधिक खर्च करने के बावजूद आज गांव के दलित, आदिवासी व किसानों को जंगलों में, खेतों में व थानों में क्रमश: अपने रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिये रिश्वत देनी पड़ती है.

लोगों को मामूली से काम जैसे बी.पी.एल. कार्ड, जाति प्रमाण पत्र, जॉब कार्ड बनवाना इत्यादि के लिये एक सरकारी कार्यालय से दूसरे कार्यालय, एक विभाग से दूसरे विभाग एवं एक टेबल से दूसरी टेबल पर धक्के खिलवाये जाते हैं और उन्हें तंग भी किया जाता है. ग्रामीण से घूस ली जाती है. फिर भी यह निश्चित नहीं है कि घूस लेने के बाद भी कार्य हो जायेगा. आजादी के 64 वर्ष बाद भी, साधारण आदमी नौकरशाही एवं नेताओं से काम लेने में परेशानी महसूस करता है. बहुतों ने तो इनसे आशा रखना ही छोड़ दी है. जनकल्याणकारी राज्य के नाम पर सत्ताधारियों ने लोगों को भिखारी बना दिया है. भारत को आत्मनिर्भर व स्वाभिमानी समाज बनाने का सपना अभी भी अधूरा है.

आज गरीब लोगों की स्थिति यह है कि उन्हें अपनी वृद्घावस्था पेंशन, विधवा पेंशन या अन्य सरकारी योजनाओं के हक के लिये लंबी कतार में खड़ा रहना पड़ता है और उन्हें अपमान भी सहना पड़ता है. दुर्भाग्य की बात यह भी है कि सत्ताधारी दलों द्वारा देश के सारे प्राकृतिक संसाधनों (जल, जंगल, जमीन एवं खनिज संपदा) को दुनिया के ताकतवर लोगों को मुनाफा कमाने के लिये कौडिय़ों के दाम पर बेचा जा रहा है.

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