सरकार अड़ियल और असंवेदनशील : पी.वी.राजगोपाल

 नई दिल्ली| केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय भूमि सुधार समिति की सिफारिशों पर पिछले पांच वर्षो में कोई कार्रवाई नहीं होने के विरोध में देशव्यापी जनसंवाद यात्रा पर निकले जानेमाने गांधीवादी राजगोपाल पी. वी. ने सरकार पर अड़ियल और असंवेदनशील रुख अपनाने का आरोप लगाया है। इस वर्ष राजधानी में होने वाले जनसत्याग्रह आंदोलन की तैयारी के सिलसिले में अब तक 17 राज्यों में 47 हजार किलोमीटर की यात्रा पूरी कर चुके राजगोपाल ने आंदोलन से जुड़े तमाम मुद्दों पर आईएएनएस से बातचीत की। प्रस्तुत है वार्ता के प्रमुख अंश :

वर्ष 2007 की जनादेश यात्रा के बाद भूमि सुधार की दिशा में क्या प्रगति हुई?

जनादेश यात्रा भूमि के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर बहस का मुद्दा बनाने में सफल रही है। जनादेश के दबाव में वन अधिकार अधिनियम बनवाने में सफलता मिली और उसे लागू करने की दिशा में कुछ प्रयास भी हुए। इस अधिनियम के माध्यम से देश में करीब 12 लाख लोगों को अब तक पट्टा मिल चुका है। इसमें लगभग 20-30 प्रतिशत ऐसे लोग होंगे जिन्हें बहुत कम मात्रा में जमीन मिली इसीलिए इस अधिनियम को ईमानदारी से लागू करने की बात अभी भी उठाने की जरूरत है। तीसरी उपलब्धि हम इस बात को मान सकते हैं कि भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर पुनर्विचार के लिये सरकार बाध्य हुई है और पुनर्वास को लेकर एक विधेयक पास किया गया है।

आपने भूमि सुधार के मसले पर सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री और राहुल गांधी सहित तमाम नेताओं को पत्र लिखा?

जनादेश के दौरान सोनिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बहुत हद तक राष्ट्रीय भूमि सुधार समिति और राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद का गठन उनके प्रयास से सम्भव हुआ। इस बार भी एकता परिषद के प्रतिनिधिमंडल ने राहुल गांधी और जयराम रमेश से बात की है और सोनिया गांधी ने मेरे पत्र का जबाब भी दिया।

 आपने हाल ही में कहा था कि अब सरकार से केवल भूमि सुधार के मसले पर बात नहीं होगी बल्कि उन तमाम मुद्दों को उठाया जाएगा जिससे शहरी मध्य वर्ग के साथ गरीब जनता प्रभावित है।

भूमि अधिग्रहण और गरीबों के पक्ष में भूमि सुधार न होने से पलायन बड़ी समस्या बन गई है। शहर में जैसे-जैसे झुग्गी झोपड़ियों की संख्या बढ़ेगी वैसे-वैसे शहरवासियों की समस्याएं भी बढ़ेंगी क्योंकि भारत के किसी भी शहर में गरीबों को बसाने या उन्हें न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध कराने की तैयारी नहीं है।

मध्यम वर्ग को इस बात को लेकर अभी से जागना चाहिए। भूमि सुधार के माध्यम से गरीब लोगों को गांव में बसाना, गांव में ही उनके जीने लायक अवसर उलपब्ध कराना इस दृष्टि से महत्व की बात है। इसलिये गरीबों के पक्ष में भूमि सुधार की मांग मध्यम वर्ग की ओर से आनी चाहिए। दूसरी तरफ जैसे-जैसे गरीबी और विषमता बढ़ेगी वैसे-वैसे हिंसा बढ़ेगी। भारत के 120 जिलों में नक्सलवाद का आना इस बात की ओर इशारा करता है कि विषमता और हिंसा के बीच रिश्ता है। जिस देश में हिंसा और अशांति होगी उस देश में मध्यम वर्ग भी आराम से जी नहीं पायेगा।

भूमि सुधार के लिए आप करीब 25 वर्षो से आंदोलन कर रहे हैं लेकिन आज तक यह राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बन पाया है?

मैं नहीं मानता कि मध्यम वर्ग बहरा है। वे उन तमाम बातों को सुनते हैं जिससे उन्हें लाभ है। भूमि सुधार का मुद्दा उस ढंग से उनके सामने नहीं रखा गया जिससे उन्हें यह महसूस हो कि उनके लाभ की बात की जा रही है। पिछले दिनों में जो प्रयास चला है उससे हमें थोड़ी बहुत सफलता मिली है। आज की स्थिति में कुछ मुद्दे कड़वी दवा के समान हैं जिसे पीने से फायदा होगा पर पीना मुश्किल है। विकास के नाम पर हम संसाधनों के साथ जो व्यवहार कर रहे हैं उस कड़वे सच को समझने में हम जितना देर करेंगे उतना ही हम स्वयं को नुकसान पहुंचाएंगे। पूरे देश में आज आंदोलन का माहौल है। भ्रष्टाचार को लेकर हो, बांध को लेकर हो या जल, जंगल और जमीन को लेकर हो। शायद समय आ गया है कि सबलोग मिलकर दूसरी आजादी की बात जोरदार ढंग से कहें और व्यवस्था परिवर्तन के लिये माहौल बनायें।

विभिन्न आंदोलनों में आप अन्ना हजारे के साथ रहे हैं ऐसे में क्या वह जनसत्याग्रह में आपके साथ हैं?

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के मित्रों को मैंने पत्र लिख कर निमंत्रण दिया है। हर आंदोलन अपने आप में महत्वपूर्ण होते हुए भी उसकी सफलता इस बात पर निर्भर है कि अन्य आंदोलनों के साथ इस आंदोलन का क्या रिश्ता है। मैं निरन्तर कोशिश में हूं कि हर आंदोलन और हर संगठन से संवाद करूं और उनको साथ लेते हुए आगे चलूं। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के लिए भी दरवाजा खुला है। जितना मेरे से बन पड़ा उतना सहयोग मैंने उन्हें दिया है अब उन्हें तय करना है कि वे किस प्रकार आम लोगों और वंचितों के जल, जंगल और जमीन के मुद्दे से जुड़ना चाहते हैं।

क्या आपको नहीं लगता कि सरकार इस तरह के आंदोलनों को कुचलने की ताकत रखती है?

सरकार छोटे-बड़े सभी आंदोलनों को कुचलने की कोशिश में है। सरकार के अड़ियल रवैये से ही तमाम अहिंसक आंदोलन हिंसक होते गए। यह एक प्रकार से सरकार की अपनी पराजय है। चूंकि सरकार अहिंसक आंदोलनों से निपटने का ताकत नहीं रखती, इसलिए वह ऐसे प्रयास करते हैं कि सामने वाला हिंसा का इस्तेमाल करें।

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और जनसत्याग्रह में मौलिक अंतर यह है। एक ऊपर से शुरू किया गया है और दूसरा नीचे से खड़ा किया गया। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में मध्य वर्ग की अधिकता रही। जनसत्याग्रह की ताकत भूमिहीन, आदिवासी, घुमंतू जातियां, मछुआरे हैं।

हमारी मान्यता है कि प्रजातांत्रिक और अहिंसात्मक तरीके से चलाये जाने वाले आंदोलनों को कुचलने का प्रयास जो भी सरकार करेगी वह बहुत दिनों तक टिक नहीं पायेगी। वर्तमान सरकार एक के बाद एक बड़ी गलतियां करती जा रही है। मैं चाहता हूं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके साथी इतिहास से कुछ सीखें और अपने आप को प्रजातांत्रिक बनाने का प्रयास करें।

इस साल दो अक्टूबर को आप एक लाख लोगों के साथ दिल्ली पहुंचेंगे। यदि सरकार आपकी मांगों पर अड़ियल रुख अपनाती है तो आपकी रणनीति क्या होगी?

जनसत्याग्रह को लेकर सरकार क्या रुख अपनाएगी यह कहना कठिन है। आंदोलनकारी लोग संघर्ष और संवाद दोनों की तैयारी में हैं। हमने बार-बार सरकार को लिखा है कि अगर संवाद से समस्या हल करना चाहें तो हम तैयार हैं। चूंकि हमें अहिंसक आंदोलन पर पूरा भरोसा है अत: हमारी ओर से आंदोलन पूर्णरूप से अहिंसात्मक रहेगा। मैं अभी भी उम्मीद कर रहा हूं कि भगवान सरकार को सदबुद्धि देंगे और सरकार अपने अड़ियल रवैये से बाहर निकल कर देश के वंचितों के लिए सोचेगी और काम करेंगी।

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