दो पाटन के बीच फंसे आदिवासी

जमीनी सच्चाई यह है कि आदिवासी दो बंदूकों के बीच फंसकर रह गए हैं। माओवादी उन पर पुलिस का मुखबिर होने का शक करते हैं तो दूसरी ओर पुलिस को उन पर माओवादियों के समर्थक होने का अंदेशा रहता है। आमाबेड़ा और अंतागढ़ क्षेत्रों के ग्रामीण अजीब उलझन में जिंदगी बसर कर रहे हैं, क्योंकि दोनों ही ग्रुप पुलिस की वर्दी में आते हैं। ऐसे में उन्हें इस बात का कतई आभास नहीं हो पाता है कि कौन माओवादी है तथा कौन-सा ग्रुप वास्तव में सुरक्षा बल है।

प्राकृतिक संसाधन और आदिवासी संस्कृति से समृद्ध छत्तीसगढ़ को इस रूप में जानने की बजाए उसे नक्सल प्रभावित क्षेत्र के रूप में कहीं अधिक याद किया जाता है। विशेषकर बस्तर और उसके आसपास के क्षेत्रों से आपको नक्सलवाद से जुड़ी खबरों के अतिरिक्त कुछ और सुनने अथवा पढ़ने को नहीं मिलेगा। विकास की खबरें यहां शून्य हैं। इन क्षेत्रों से गुजरते हुए अक्सर लोग यह सलाह देते हुए मिल जाएंगे कि आप आमाबेड़ा और अंतागढ़ जैसे क्षेत्रों में न जाएं, क्योंकि वहां हथियारबंद दस्ता मौजूद है। आमाबेड़ा जाते हुए सड़क के दोनों ओर आपको उनकी उपस्थिति का अहसास हो जाएगा। रास्तों पर लगे बैनर और पर्चे उनकी मौजूदगी का एलान करते हैं। ऐसी परिस्थितियों में आप कल्पना कर सकते हैं कि वहां के युवा आदिवासियों को किस प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। कई नौजवान बिना किसी ठोस सबूत के वर्षों से जेल की सलाखों के पीछे जिंदगी गुजार रहे हैं। इस क्षेत्र को करीब से जानने वाले मेरे मित्र अजय बताते हैं कि अकेले कांकेर जैसी छोटी जेलों में तीन सौ आदिवासी युवा बंद हैं। राज्य की ऐसी कई जेल इसी का उदाहरण प्रस्तुत कर रही हैं। स्थानीय निवासियों के अनुसार, राज्य की विभिन्न जेलों में हजारों युवा आदिवासी केवल इस आरोप में ठूंस दिए गए हैं कि उन्होंने कभी हथियारबंद दस्ते के किसी सदस्य को एक वक्त का खाना खिलाया था। जबकि वास्तविकता यह है कि आज भी आदिवासी घर आए मेहमान के पांव धोकर और माथे पर तिलक लगाकर उनका स्वागत करने की अपनी महान परंपरा का पालन करते हैं तथा बगैर भोजन कराए उन्हें जाने नहीं देते हैं। ऐसी परिस्थिति में जब कोई व्यक्ति उनके पास बंदूक लेकर आए तो क्या वह उन्हें किसी भी चीज के लिए मना कर सकते हैं? विशेष रूप से जबकि उन्हें इंकार करने का परिणाम मालूम है।

माओवादियों से कारगर ढंग से निपटने की बजाए बेकसूर स्थानीय निवासियों को जेल में डालने से समस्या का हल निकलने की बजाए और भी पेचिदा हो जाएगा। समस्या के इस प्रकार निपटारे से नौजवानों में शासन के प्रति अविश्वास उत्पन्न हो रहा है और वह हिंसा की ओर अग्रसर हो रहे हैं। माओवादियों का साथ देने के आरोपों का सामना कर रहे स्थानीय नौजवानों के सामने दो ही विकल्प रह जाते हैं- या तो वह वास्तव में बंदूक उठाकर उनका साथ दें अथवा गांव छोड़कर चले जाएं। जो इस बात की ओर इशारा है कि शासन धीरे-धीरे स्थानीय जन समर्थन खो सकता है।

जमीनी सच्चाई यह है कि आदिवासी दो बंदूकों के बीच फंसकर रह गए हैं। माओवादी उन पर पुलिस का मुखबिर होने का शक करते हैं तो दूसरी ओर पुलिस को उन पर माओवादियों के समर्थक होने का अंदेशा रहता है। आमाबेड़ा और अंतागढ़ क्षेत्रों के ग्रामीण अजीब उलझन में जिंदगी बसर कर रहे हैं, क्योंकि दोनों ही ग्रुप पुलिस की वर्दी में आते हैं। ऐसे में उन्हें इस बात का कतई आभास नहीं हो पाता है कि कौन माओवादी है तथा कौन-सा ग्रुप वास्तव में सुरक्षा बल है, और फिर हम इन भोले-भाले अनपढ़ ग्रामीणों से यह आशा कैसे कर सकते हैं कि ये सुरक्षा बल और माओवादियों में अंतर को पहचानें। कहीं न कहीं हमारी व्यवस्था की खामियों ने उनके जीवन को एक ऐसे अविश्वास के अंध्ो कुएं में धकेल दिया है, जहां आदिवासी अपना जीवन महज गुजार भर लेने के लिए संघर्षरत हैं। छत्तीसगढ़ में पुलिस और पारा मिलिट्री फोर्स की उपस्थिति यहां एक नई प्रथा को जन्म दे रही है। यदि आप यहां के निवासी नहीं हैं अथवा आपको आदिवासी परंपरा का ज्ञान नहीं है तो आपको स्थानीय संस्कृति का अंदाजा नहीं हो सकता है। यहां तैनात पुलिस और पारा मिलिट्री फोर्स का कुछ ऐसा ही हाल है। वह स्थानीय निवासियों से कुछ ऐसे अंदाज में व्यवहार करते हैं, जो उनकी परंपरा के विपरीत है। आदिवासी महिलाएं जो उन्मुक्त वातावरण में रहती थीं, अब ऐसा नहीं कर पाती हैं और यहां तक कि उन्हें अपनी दैनिक दिनचर्या को निपटाने में भी कठिनाइयों से जुझना पड़ता है। सुरक्षा बल और माओवादी दोनों की उपस्थिति आदिवासियों के लिए बहुत सारी कठिनाइयों को जन्म दे रही है, जो उन्हें निराशा के घोर अंधेरे की ओर धकेल रही है।

एक ऐसे वातावरण में जहां आदिवासी प्रत्येक क्षण खौफ में जी रहे हों, ऐसे मुश्किल समय में उनके लिए आशा की किरण के रूप में वहां कार्यरत कुछ सामाजिक संगठन हैं, जो उनके अधिकार के लिए प्रत्येक मोर्चे पर संघर्षरत हैं। हालांकि उनकी स्थिति भी बहुत हद तक आदिवासियों की तरह है, जिन्हें दोनों ओर से मुखबिर समझा जाता है और उनके नेक कार्यों को भी शक की निगाह से देखा जाता है। यदि उन्हें अपना कार्य आदिवासियों की भलाई के लिए करना है तो उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में बेखौफ होकर कार्य करने की आवश्यकता है, विशेषकर सुदूर जंगली क्षेत्रों में। परंतु शासन-प्रशासन को यह मंजूर नहीं। इसके विपरीत उनके कार्यों को नक्सल समर्थक से जोड़ कर देखा जाता है। उन पर यह आरोप लगाया जाता है कि उनके कार्य नक्सलियों के लिए जमीन तैयार करने में सहायक हैं। इस आरोप में कई बार सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल भी भेजा गया है। परंतु उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिल पाया है।

छत्तीसगढ़ में कई गैर सरकारी संगठन एकता परिषद ट्रेनिंग प्रोग्राम का हिस्सा हैं। बड़ी संख्या में क्षेत्र के युवा एकता परिषद की अहिंसात्मक विचारधारा के तहत सम्मानजनक जीवन तथा अपने संसाधन पर हक पाने की मुहिम का हिस्सा बने हुए हैं। इन्होंने महात्मा गांधी की अहिंसात्मक विचारधारा पर चलने का प्रण किया हुआ है तथा इसी माध्यम से जड़, जंगल और जमीन की वापसी की कोशिश में लगे हुए हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि विषम परिस्थितियों में भी यह अपनी विचारधारा से विमुख होकर हिंसा का रास्ता नहीं अपनाएंगे। ऐसे में इन पर हिंसात्मक विचारधारा के समर्थकों के लिए जमीन तैयार करने में सहायता देने का आरोप पूर्ण रूप से निराधार है। अलबत्ता यह लोग सरकारी तंत्र और उसके कामकाज के कटु आलोचक अवश्य हैं। जो तंत्र को चलाने वालों को रास नहीं आता है और उनके लिए सबसे आसान उपाय इन्हें नक्सली समर्थक करार देना होता है। मेरे विचार में हमें विचारधारा बदलने और जमीनी हकीकत से रूबरू होने की आवश्यकता है। इसके लिए एयरकंडीशन रूम से निकल कर और कागजों में प्लान तैयार करने की अपेक्षा सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर कार्य करने की जरूरत है, क्योंकि इनमें अधिकतर स्थानीय निवासी हैं जो छत्तीसगढ़ की जमीन को जड़ से समझते हैं। इन्हें साथ लेकर चलने से न सिर्फ विकास की वास्तविक परिभाषा सार्थक होगी, बल्कि क्षेत्र में जड़ जमाते नक्सलियों को भी मुंह तोड़ जवाब दिया जा सकता है।

बदकिस्मती से यह आसान सा सिद्धांत किसी के समझ में नहीं आ रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह बात तय कर ली गई है कि जो कोई सरकारी तंत्र की आलोचना करे, वह नक्सली समर्थक है और उसके साथ वही कानून और धाराओं का इस्तेमाल किया जाता है जो नक्सलियों के लिए बनाई गई हैं। ऐसे समय में जबकि सरकारी कर्मचारी खौफ से ग्रामीण क्षेत्रों में जाने से डरते हैं, आपके पास ऐसे लोग मौजूद हैं जो कम से कम गांवों में जाकर हाशिए पर जीवन बसर करने वाले समुदाय को मदद पहुंचाना चाहते हैं। यह बड़ी विचित्र बात है कि सरकारी अधिकारी नक्सलियों के डर से ग्रामीण क्षेत्रों में जाने से कतराते हैं और इन सामाजिक संगठनों को भी जाने से रोकते हैं, जबकि उन्हें वहां जाने में कोई समस्या नहीं होती है। इसके पीछे केवल यही कारण है कि यह सामाजिक संगठन सरकारी अधिकारियों के काम करने के ढंग की मुखर आलोचना करते हैं। यदि आप इस पूरे प्रकरण को अच्छी तरह से समझते हैं तो आपको स्पष्ट रूप से नजर आ जाएगा कि वह लोग यहां की आबादी को सशस्त्र बल के रहमोकरम पर छोड़ देना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ और झारखंड में ऐसे संगठन हैं, जो इस तनाव को खत्म करने की बजाए इस पर अपने फायदे की रोटी सेंकना चाहते हैं। मुझे ऐसा महसूस होता है कि इस तनाव और हिंसा से कई लोगों को फायदा मिलता है। यह कौन लोग अथवा संगठन हैं, यह विचारनीय है। एक कहावत है कि जब अधिक लोग बीमार होते हैं तो डाक्टर खुश होता है, इसी प्रकार जब किसी इलाके में कोई तनाव होता है तो राजनीतिक दल खुश होते हैं। छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक संसाधन को राज्य से बाहर ले जाने के लिए इस प्रकार का तनाव काफी कारगर सिद्ध हो सकता है। अब प्रश्न यह उठता है कि हम छत्तीसगढ़ को इस हिंसा से किस प्रकार बचाएं? (चरखा)

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