दस पत्रों का कोई उत्तर नहीं

एकता परिषद के अध्यक्ष और गांधीवादी पीवी राजगोपाल से द पब्लिक एजेंडा की बातचीत

संसद के अगले सत्र में जमीन अधिग्रहण को लेकर बिल पारित किये जाने पर आपकी क्या राय है?
देश भर में व्यापक होते विरोध को शांत करने के लिए सरकार संसद के अगले सत्र में भूमि अधिग्रहण का नया झुनझुना लेकर आ रही है। किसान और सामाजिक आंदोलनों में लगे लोग बखूबी जानते हैं कि कांग्रेस सरकार की इस खानापूर्ति का मकसद “नेशनल लैंड रिफॉर्म काउंसिल’ को दरकिनार करना है, जो सही मायने में जनता की जरूरतों वाला अधिग्रहण कानून बना सकती है।

लैंड रिफार्म काउंसिल यह काम कैसे कर पायेगी?
इसका गठन सन् 2007 में उस समय किया गया था जब 25 हजार किसान दिल्ली में भूमि सुधार कानून बनवाने की मांग के साथ दिल्ली पहुंचे थे। इस काउंसिल में प्रधानमंत्री, कई राज्यों के मुख्यमंत्री, कैबिनेट सचिव समेत कुछ मेरे जैसे सामाजिक आंदोलनों के लोग भी हैं। भूमि सुधार के लिए 20 सदस्यों वाली इस संयुक्त समिति के गठन के बाद से मैं अब तक प्रधानमंत्री को दस चिट्ठियां लिख चुका हूं,पर काउंसिल के सिफारिशों पर सरकार को विचार करने का मौका नहीं है। सरकार ऐसा कोई कानून नहीं बनाना चाहती जिससे बेलगाम अधिग्रहण पर बंदिश लग सके।

काउंसिल किस तरह का जमीन अधिग्रहण कानून चाहती है?
काउंसिल भूमि सुधार कानून बनाने के लिए गठित की गयी है जिसकी एक जिम्मेदारी जमीन अधिग्रहण कानून के लिए सिफारिशें करना है। हमारा मानना है कि पहले तो जमीन अधिग्रहण होना ही नहीं चाहिए और अगर होता है तो उस पर अंतिम निर्णय का अधिकार ग्राम पंचायतों को होना चाहिए। अगर अधिग्रहण स्थानीय लोगों की जरूरतों को पूरा करने वाला होगा तो जाहिर है, लोग जमीने देने में नहीं हिचकेंगे। लेकिन 500 हेक्टेयर की परियोजना के लिए दस हजार हेक्टेयर कब्जा करने के खेल को अब किसान भी समझ गये हैं। ओडिशा के पुरी जिले में खनन कंपनी वेदांता ने विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए 8 हजार एकड़ जमीन कब्जाना शुरू किया। दुनिया में बड़े से बड़ा विश्वविद्यालय एक हजार एकड़ से अधिक में नहीं होगा। ऐसे में 8 हजार एक खनन कंपनी क्यों लेना चाहती है, इसे कौन नहीं समझता।

मीन अधिग्रहण के हरियाणा मॉडल को अपनाने की बात हो रही है। आपकी राय?
किसी भी राज्य में होने वाले कुल जमीन अधिग्रहण का 70 से 75 प्रतिशत सीधे कंपनियां खरीदेंगी और 25 से 30 फीसदी सरकार खरीदेगी – इसी को हरियाणा मॉडल के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। अगर यह कानून सरकार लागू करती है तो अधिग्रहण कानून में व्यापक स्तर पर अराजकता फैलेगी क्योंकि निजी मालिक धमका कर, लालच देकर या किसी और भी तरीके से किसानों -आदिवासियों से हस्ताक्षर करा लेने का जुगाड़ करेंगे। इसके लागू होते ही गुंडागर्दी और निजी सेना का इस्तेमाल बढ़ेगा। इसलिए सरकार को ऐसा कोई कानून बनाने से पहले भविष्य में उभरने वाले गंभीर संकटों का भी आकलन कर लेना चाहिए।

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